स्लीप पैरालिसिस
लेकिन मे उठ जाता 3–5मिनट बाद। जो मेहसूस करता है वो अपनी जीन्दगी मे जीने के लिये लड़ रहा होता है खुद्से की मै उठूँगा। उसे पता होता है की कोई भी उसे नही उठा सकता। जब भी मै उठता अपनी मम्मी के पास जाकर चिपट जाता की मै इनके पास ही मेह्फूज़ हूँ लेकिन कल होती मै सबको बताता की मेरे साथ ऐसा हुआ तो कोई मेरी बात पर यकिन नहीं करता मम्मी कहतीं की तू भुत की फिल्में देखता है इसलिये ऐसा होता है।
लेकिन मुझे धीरे धीरे इस चीज़ की आदत हो गयी। कभी कभी ऐसा होता की जैसे मेरी आंखे लगी मै फिरसे इसी अवस्था में दुबारा आ जाता। डर कभी कम नहीं हुआ। मै मन में हनुमान चालीसा बोलता लेकिन कुछ असर नही होता उस बक्त मै खुद्को सबसे हारा हुआ समझता की अब मेरी मदद कोई नही कर सकता। कभी कभी मुझे ऐसा हो जाता है तो मै अपने मुहँ को खोलने की कोशिश करता हूँ। हर किमत अपनी ताकत लगा देता हूँ की मै उठ जाऊंगा। या कभी कभी इसे अनदेखा कर सो जाता हूँ या कभी कभी बहुत डर जाता हूँ की शायद मैं कभी उठ ही ना सकूं। मेने डॉक्टर से भी बात की लेकिन वो इस बात को अनदेखा कर देते हैं हसकर की एसा नही होता या फिर की मे दवाई दूंगा एसा नही होगा।
लेकिन जितना मैने इसे खुद्से अनुभव किया इससे मुझे पता चलता है की ये हमारे ज्यादा सोचने, भुत प्रेत जेसी चीज़ों पर ध्यान देना। हर चीज़ के लिये चिंतित रहना, हमेशा गलत सोचना की कहीं मेरे साथ एसा ना हो जाए या मेरे साथ गलत ही होगा जब भी होगा।, जीने की चाह ही ना बचा हो। तो वही सब सोचें हमे एक पल में घेर लेतीं है स्लीप पेरालाईज़ जिसे हम कहते हैं लेकिन कभी कभी ये हमे बिना किसी वजह के भी हो जातीं हैं। लेकिन मै सबसे यही कहूंगा की जीतना हो सके खुश रहिये और हर जगह गल्तियों को देखने से अच्छा हम अच्छाईं देखें जो हमारे आस पास हैं। क्युकी हम इसे किसी दवाई से ठीक नहीं क्र सकतें हम खुद्से ही इसे ठीक कर सकतें हैं खुश रहकर। और मै सभी से अनुरोध करूंगा की अगर आपसे कोई यही बात कहे की उसके साथ रात को ऐसा होता है।
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